poetry by kavi chavi

Saturday, January 23, 2010

औरत

............स्त्री ............

स्मृतियों की पोटली से
छांटती रही वह
सुख के क्षणों को /जो न मिले
घुटन,पीड़ा,अवसाद भरे क्षण ही
कौंधते रहे स्मृतियों में
चूल्हे के भीतर रखी
गीली लकड़ियों से
उठता धुंआ भर आया आँखों में
जुठें बर्तनों की कालिख
पसर आई मन पर
झाड़ू बुहारते
आँगन लीपते
हाथों ने जब उठाये
विश्राम के कुछ क्षण ...
अचानक आ पड़ी एक लात /पीठ पर
...और वर्तमान की तरह
असभ्य /कुछ शब्द
बटोर लिया
घुटन,पीड़ा ,अवसाद
भरे क्षणों को ...
बांध पोटली में
टांग खूटें पर
उठा ली पास ही रखी झाड़ू
...घर के भीतर का एक कोना
कुछ गन्दा सा दिखाई दिया था ...//

Friday, January 22, 2010

कवी

.......कवी ................

उसे ज्ञान नहीं था
प्रतीकों का
बिंब क्या होतें हैं
वह जानता ही न था
शब्द चयन अथवा काव्य विन्यास
जैसी बातें सुनकर
वह केवल हंस सकता था
पूरी तरह मुर्खता पूर्ण हसीं ...
फिर भी ...
जो कुछ भी वह कह रहा था
वह सच था /उसके चेहरे पर लिखा हुआ
आस्था ,विश्वास ,स्वप्न
उत्साह ,चेतना ,और कुछ नहीं
कुछ भी नहीं ...
वह बता रहा था /किस तरह
खुशियों को परहेज रहा उससे
...स्वप्न कभी उत्सव नहीं बन पाए
और मातम बैठा रहा
सदियों की परिचय गाथा लिए
किसी भविष्य वक्ता की तरह ...
की किश तरह /अंधेरों ने ही बताया
प्रकाश जैसी किसी चीज का नाम
की ईश्वर निश्चित ही
विकलांग और नेत्रहीन है
वह बता रहा था यह सब
और मैं महसूस कर रहा था
की कोई अकवि /अनंत काल का
अँधेरी कंदराओं में बैठ
दीर्घ नि :श्वासों के बीच
सुना रहा है कोई कविता ...
निश्चित ही वह कवी नहीं था ...//
२२ /०१/२०१०

महापुरुष

..............महापुरुष ....................

लालटेन की कसमसाती रौशनी के बीच
छोटी और धुंधली परछाइयों की तरह
कभी भी .........
हावी नहीं होने दिया
अपने अनगिनत दुखों को
गिनती भर सुखों पर
उसे मुस्कुराने के लिए
कभी प्रयास नहीं करना पड़ा
और वह कभी ठहाके लगा कर नहीं हंसा
अपने स्वघोषित आपातकाल में भी
अजीब आदमी था ...
कोई समस्या नहीं थी
उसके लिए समस्या
बस एक चुनौती भर /जिसे स्वीकार करते
चिन्ताओ की झाइयों को परे धकेल
दिखाई दिया सदैव ही
एक प्रकाश स्तम्भ /उसके काँधे पर
बहुत अजीब आदमी था ...
मानवीय सभ्यताओं के सभ्य महापुरुषों की तरह
कुछ आशावादी /और बहुत जिद्दी
शायद इसीलिए स्वीकार नहीं कर सका
अपनी हार ......
निरंतर बढ़ता रहा /जीत की तलाश में
संभवतः उसका व्यतिगत कुछ था ही नहीं
सब कुछ सार्वजनिक
हार भी .......
इसीलिए अस्वीकार रही /जीवन भर
किन्तु ,मृत्यु के एक छड पूर्व
कंठ से निकली थी एक आह
कापतें हाथों में था उदास स्पर्श
और आँखों में पराजय की आहत शर्मिंदगी ...
(मानवीय सभ्यताओं के दिवंगत
सभ्य महापुरुषों की अंतिम नियति )
उसकी आँखों ने छलका ही दी थी
एक बूँद ...
...और मैं महसूस करता रहा
की मेरा पिता /साधारण पुरुष क्यूं न हुआ .../

२२ /०१ २०१०

Thursday, January 21, 2010

सरहद

............सरहद .....................

जहाँ कभी होती थी चर्चा

गाँव की नई बहू सुन्दर है /परिश्रमी है

या नए ढंग के खुले पन के साथ

थोड़ी फूहड़ ...

अब नहीं होती चर्चा

रहता है एक मौन /अपनी गंभीरता के साथ

वो चौपाले जो किया करती थीं

सही और गलत के बीच फर्क

अब भी होता है शोर /लम्बी बहस

अर्थ हीन अर्थो के साथ

खेत खलिहानों में
रहती है बैचेनी
अनियंत्रित असय्न्मित बादलों को देख कर
की हवाएं अब पहले सा स्पर्श नहीं करती
कोयल की कूक /जा बैठी है
कोए के गले में ...
अब हर चूल्हे पर
रखी है एक हांड़ी
पक रहें है जिसमे
चिन्ताओ से उभरे कुछ प्रश्न
और यह डर ...
की निगलता जा रहा है शहर
गाँव की सरहदों को ............//

विरासत

..........विरासत ......................

.मैंने अपनी वसीयत में
नहीं किया है जिक्र
अपने पुश्तेनी मकान का
जिसकी छत पर
कल ही डाले गए हैं /नए कबेलू
उन खेत खलिहानों का
जो कभी बंजर थे
...और जिन्हें
मेरे पसीने ने दिया था
मातृत्व वरदान ...
न ही उस जमा पूंजी का
जिसे जमा करते /मैं देख नहीं पाया
की उम्र ढल रही है
जर्जर होते शरीर के साथ
...मैनें अपनी वसीयत में लिखा है
की सौंप रहा हूँ तुम्हें
कुछ उत्सव /जिसमे तुम्हे शामिल होना है
बूढ़े -विशाल वाट वृक्ष के नीचे
कुछ मातम ...
जो तुमसे शब्द नहीं /संवेदना चाहेंगे
...और वह मूल्य ...
जिन्हें खारिज करना
अपनाने से भी कठिन हो
ओ मेरे वीर पुत्र
उसी छड /तुम समझ पाओगे
की तुम्हारें पिता के पास
और कुछ नहीं था
तुम्हें देने के लिए /विरासत में .......//

२१ /०१ २०१०

Wednesday, January 20, 2010

एकांत

.............एकांत .........................

"शांत उपवन हो या हो एकांत निर्जन

कोई छड हो मन नहीं विश्राम पाता

याद आता मौन अधरों का तुम्हारें

और कभी चेहरा तुम्हारा मुस्कुराता



शांत उपवन हो .............................



दृश्य धूमिल ही सही ,जीवित सभी हैं

शब्द विस्तृत अर्थ ले आतें अभी हैं

खो गए सामीप्य के हों पाश पावन

शेष ,किन्तु प्रेम की व्याकुल नदी है

स्वप्न का नयनों से हो चाहे अपरिचय

आ ह्रदय में स्वप्न जीवन को जगाता

शांत उपवन हो ...............................



रात्रि की निस्तब्धता में चाँद भी कल
था मेरी ही भातीं अस्थिर और चंचल
थे छितिज पर चमकते नयना तुम्हारे
श्रृष्टि पर फैला हुआ था क्लांत आँचल

दृष्टि भ्रम या सत्य ही भ्रम बन गया था
था तुम्हारे स्वर में कोई गुनगुनाता
शांत उपवन हो ............................//......प्रेमप्रदीप

मासूमियत

...........मासूमियत .................

मैं नहीं समझता
की पाप होता है
मंदिर के सामने से गुजरते
सिर न झुकाना
या सड़क पर पड़ी मृत देह को
भीड़ की शक्ल में घेर
संवेदना प्रकट न करना
...मैं यह भी गलत नहीं समझता
की बच कर निकल जाया जाये
उन लोगों से /जो मांगते है
थोडा सा वक़्त ...
कुछ शब्द ...
कोई आश्वासन ...
मैं समझता हूँ /कुछ गलत है
कोई पाप है /तो बस ...
किसी बच्चे की बच्ची मुस्कराहट को
सख्त बूढी आँखों से देखना
उनके पैरों को थपथपाना
और बताना ...
की ज़मीं पथरीली और ठोस है
की स्वप्न देखना मुर्खता है
की स्वप्न सच नहीं होते ......//

२०/०१ २०१०