poetry by kavi chavi

Tuesday, April 12, 2011

ना प्रेम पुष्प खिल सके ....
                                       विदीर्ण हो गया ह्रदय
                                       न सुर रहा रही न लय
                                       नस-नस में मॉस पिंड के
                                       था मच रहा महाप्रलय
स्नेह के क्षण मात्र भी न मिल सके
न प्रेम पुष्प खिल सके .......
                                       मै छाँव की तरह रहा
                                       वो धूप, जो न ढल सकी
                                       पतंगे सा मै जल गया
                                       वो मोम न पिघल सकी
जो घाव ह्रदय में हुए न सिल सके
न प्रेम पुष्प खिल सके ......................................||
                                                                                     १२/०४/2011
घन गरज-गरज रिम झिम बरसे
तन हो पुलकित मन भी हर्षे
ऐसे में प्रियतम आन मिले
बांहों में भर ले आ कर  के
घन गरज ............

है झुलस रही यह देह सखी
अधरों पर प्यास है जाग उठी
यौवन की कलियाँ झूम रही
मन उपवन में हडकंप मची
आश्वाशन ओढ़ भला कब तक
प्रियतम वियोग में मन तरसे
घन गरज ..........

है नाच उठी धरती सारी
इठलाती बादरिया कारी
भीगे छप्पर भीगे आँगन
भीगे कोयलिया कजरारी
है मात्र मेरा ही शौक दिवस
मन व्याकुल दुख की गागर से
घ गरज ............

वो आज सखी जो आजायें
तो नयनों को सुख पहुचाएं
मनुहार करे स्वीकार करे
बांहों का आँचल पहनाएं
बन कर विशाल मै नदी
पुनः मिल जाऊं अपने सागर से

घन गरज-गरज रिम झिम बरसे
तन हो पुलकित मन भी हरसे
ऐसे में प्रियतम आन मिले
बांहों में भर ले आ कर के ...||
                                                     १२/०४/2011

samay

मैंने खो दिया है समय को
और उस खोय हुए समय के साथ /
खुद को...
याद नहीं /हुआ हो हमारे बीच
कभी कोई वार्तालाप ...
समय ने मुझ पर
या मैंने समय पर
किया हो कोई हस्ताछर /इसका भी कोई प्रमाण नहीं ...
हम बस देखते रहे
एक ही राह में
...किन्तु भिन्न दिशाओं में
एक दूसरे को गुजरते
इस कोशिश में
की गुजर जाएँ
बिना आवाज दिए
एक दूसरे को /
...और इस तरह की यात्रा
मैंने और मेरे समय ने ...||
                                                १२/०४/2011


Saturday, January 23, 2010

ग़ज़ल

दो घडी और जियें दिल में ये हरसत न रही
आज जब दुनियां में इन्सान की कीमत न रही
तंग दिल वालों की क्या बात करें हम यारों
इस जमानें के शरीफों में शराफत न रही
देख जिसको निगाहें बर्फ सी जम जाएँ कहीं
बाजारे-हुश्न में अब ऐसी नज़ाक़त न रही
आज भी देख कर नज़रें झुका चल देते हैं
कैसे कह दें की उन्हें हमसे मोहब्बत न रही
बंद कमरे में तोड़ते है रिश्ते रोज़ मगर
ज़ल्सों में कहते है अब कोई खिलाफत न रही
एक हम है की उनका नाम लिए जाते हैं
एक वो है की उन्हें हमसे मोहब्बत न रही .../
२२/०१/२०१०

औरत

............स्त्री ............

स्मृतियों की पोटली से
छांटती रही वह
सुख के क्षणों को /जो न मिले
घुटन,पीड़ा,अवसाद भरे क्षण ही
कौंधते रहे स्मृतियों में
चूल्हे के भीतर रखी
गीली लकड़ियों से
उठता धुंआ भर आया आँखों में
जुठें बर्तनों की कालिख
पसर आई मन पर
झाड़ू बुहारते
आँगन लीपते
हाथों ने जब उठाये
विश्राम के कुछ क्षण ...
अचानक आ पड़ी एक लात /पीठ पर
...और वर्तमान की तरह
असभ्य /कुछ शब्द
बटोर लिया
घुटन,पीड़ा ,अवसाद
भरे क्षणों को ...
बांध पोटली में
टांग खूटें पर
उठा ली पास ही रखी झाड़ू
...घर के भीतर का एक कोना
कुछ गन्दा सा दिखाई दिया था ...//

Friday, January 22, 2010

कवी

.......कवी ................

उसे ज्ञान नहीं था
प्रतीकों का
बिंब क्या होतें हैं
वह जानता ही न था
शब्द चयन अथवा काव्य विन्यास
जैसी बातें सुनकर
वह केवल हंस सकता था
पूरी तरह मुर्खता पूर्ण हसीं ...
फिर भी ...
जो कुछ भी वह कह रहा था
वह सच था /उसके चेहरे पर लिखा हुआ
आस्था ,विश्वास ,स्वप्न
उत्साह ,चेतना ,और कुछ नहीं
कुछ भी नहीं ...
वह बता रहा था /किस तरह
खुशियों को परहेज रहा उससे
...स्वप्न कभी उत्सव नहीं बन पाए
और मातम बैठा रहा
सदियों की परिचय गाथा लिए
किसी भविष्य वक्ता की तरह ...
की किश तरह /अंधेरों ने ही बताया
प्रकाश जैसी किसी चीज का नाम
की ईश्वर निश्चित ही
विकलांग और नेत्रहीन है
वह बता रहा था यह सब
और मैं महसूस कर रहा था
की कोई अकवि /अनंत काल का
अँधेरी कंदराओं में बैठ
दीर्घ नि :श्वासों के बीच
सुना रहा है कोई कविता ...
निश्चित ही वह कवी नहीं था ...//
२२ /०१/२०१०

महापुरुष

..............महापुरुष ....................

लालटेन की कसमसाती रौशनी के बीच
छोटी और धुंधली परछाइयों की तरह
कभी भी .........
हावी नहीं होने दिया
अपने अनगिनत दुखों को
गिनती भर सुखों पर
उसे मुस्कुराने के लिए
कभी प्रयास नहीं करना पड़ा
और वह कभी ठहाके लगा कर नहीं हंसा
अपने स्वघोषित आपातकाल में भी
अजीब आदमी था ...
कोई समस्या नहीं थी
उसके लिए समस्या
बस एक चुनौती भर /जिसे स्वीकार करते
चिन्ताओ की झाइयों को परे धकेल
दिखाई दिया सदैव ही
एक प्रकाश स्तम्भ /उसके काँधे पर
बहुत अजीब आदमी था ...
मानवीय सभ्यताओं के सभ्य महापुरुषों की तरह
कुछ आशावादी /और बहुत जिद्दी
शायद इसीलिए स्वीकार नहीं कर सका
अपनी हार ......
निरंतर बढ़ता रहा /जीत की तलाश में
संभवतः उसका व्यतिगत कुछ था ही नहीं
सब कुछ सार्वजनिक
हार भी .......
इसीलिए अस्वीकार रही /जीवन भर
किन्तु ,मृत्यु के एक छड पूर्व
कंठ से निकली थी एक आह
कापतें हाथों में था उदास स्पर्श
और आँखों में पराजय की आहत शर्मिंदगी ...
(मानवीय सभ्यताओं के दिवंगत
सभ्य महापुरुषों की अंतिम नियति )
उसकी आँखों ने छलका ही दी थी
एक बूँद ...
...और मैं महसूस करता रहा
की मेरा पिता /साधारण पुरुष क्यूं न हुआ .../

२२ /०१ २०१०