poetry by kavi chavi

Thursday, January 10, 2013

आदरणीय निशा जी ...निसंदेह यथार्थ जब इस रूप में हमारे सामने हो तो कवी मन पीड़ा को गाता है ...पाठक अपनी संवेदनाओं में उस पीड़ा को पाता  हैं ....रचना और प्रतिक्रिया दोनों ही भावुक हो उठती हैं ......जिस प्रकार यह रचना अपूर्ण  रही ....यह कटु यथार्थ भी अब विश्राम ले ....हर मनुष्य संपन्न ,सामर्थ्यशील ,संभावनाओं से भरा हो तो जीवन कितना सुन्दर हो जायेगा ...है ना ....आपकी गंभीर उपस्थिति सदैव ही रचना /रचनाकार का मान बढ़ा  जाती है ......ह्रदय से धन्यवाद ..........सादर ...
"आदरणीय सलिल जी .....आपने जिस गंभीरता से इन पंक्तियों को पढ़ा ....भावों में व्यक्त पीड़ा को अनुभव किया ....ह्रदय से आपको धन्यवाद कहता हूँ ...साथ ही सब से रोचक बात रही ....आपका इन पंक्तियों में एक खंड-काव्य की सम्भावना तलाशना .....सच कहूँ तो 1997-198 में जब इसे लिखना प्राम्भ किया था तब शायद 5-6 पृष्ठों तक शब्द और भाव साथ रहे थे ...जिन कागजो पर लिखा था ..गुम हो गए .. ...अब कितना भी चाहूँ इस रचना को वह स्वरुप नहीं दे सकता ......जिस तरह मैंने अपने जीवन को अभिशापित किया उस तरह के जीवन में ....पुनर्विचार ...अथवा पुनः प्रयास जैसी सम्भावना ही ध्वस्त हो गई ...निसंदेह
माँ की ममता, जलहीन धरा ,जो खुद ही भूखी-प्यासी थी

माँ के अधरों के भांति ही ,वक्षों में गहन उदासी थी .......इसके आगे की दो पंक्तियाँ और याद आई थी कल शाम ....
" माँ के वक्षो से दूध नहीं ,केवल नैनों से अश्रु बहे
  उस माँ के पीड़ा  कौन सहे उस माँ की पीड़ा  कौन कहे ...........वह अनुभूति ....वह यथार्थ पीड़ा पुनः मन में भर .....भाव को शब्द रूप दे पाना अब निश्चित ही संभव नहीं .....प्रयास भी करूँगा ....तो मात्र बनावटी  भाव के साथ  ओढ़े हुए निर्जीव शब्द ही मुखर होंगे ......किन्तु ह्रदय की पूर्ण विनम्रता के साथ आपको नमन करता हूँ .....इस रचना को लिखते समय जो मंतव्य था ......आपने उसे  सम्भावना रूप में  उतनी ही गहराई से पकड़ा ...भावो को उतनी ही पीड़ा के साथ अनुभव किया ...इन पंक्तियों का पुनः स्मरण सार्थक हो गया ....सादर ....

Wednesday, January 9, 2013

"नहीं आदरणीय नवल जी ...यह मात्र पढने में कोई मात्रात्मक दोष नहीं था ....यह एक पाठक का नैतिक ,वैचारिक अपराध है ...यदि मै  बतौर पाठक आपको पहले से पढता रहा हूँ ...आपकी रचनाओ में आपकी छवि गढ़ता रहता हूँ तो यह अपराध अक्षम्य है .....हिन्द या हिन्दू के संशय में ...बतौर रचनाकार /पाठक आपकी निष्पक्षता को  भूल बैठा ...आपकी गंभीर तटस्थता को भूल बैठा .....माँ  वीणा वादिनी .....मन को शांति दे ...स्थिरता दें ....मुझे क्षमा करें ........सादर ............."
 

Monday, June 20, 2011

कौन कहेगा ...कौन कहेगा ...कौन कहेगा ....

डाल से टूटे पत्तो की पीड़ा को कौन कहेगा
तिल-तिल कर जलते दीपक के दर्द को कौन सहेगा

कौन लिखेगा बिन बरसे बादल है क्यूँ खो जाते
कौन लिखेगा भ्रमर हैं गीत कौन सा गाते

कौन लिखेगा नारी के अंतस के ध्वंद समर को
कौन लिखेगा परिवर्तन कारी युग संस्कृतियों के रण को

कौन लिखेगा अडिग मौन धारी श्रृष्टि की पीड़ा
कौन लिखेगा मान सरोवर में हंसो की क्रीडा

कौन लिखेगा खग समूह के वायु पथ का कलरव
कौन लिखेगा दर्पण के सम्मुख नव-वधु का अनुभव

कौन लिखेगा मानवता के प्रतिक्षण ह़ास का कारण
कौन लिखेगा न्याय ने किया क्यूँ मौन व्रत धारण

कौन लिखेगा वर्तमान के रक्त सने अध्याय
कौन लिखेगा ध्वज अधर्म के क्यूँ चहु दिशी लहराये

जो यह सब लिख देगा वह सच्चे अर्थो में कवि है
दूर तिमिर को करने हेतु नव प्रभात ,नव रवि है"

                                                                                    १७/०६/२०००

                                                                                

Tuesday, April 12, 2011

.....................बस यूँ ही ...............................

चंद शक्लों ने ही नफ़रत की फसल बोई है
अनगिनत शक्ल मोहब्बत की अजां देती है

बम ,बारूद ,धमाके,ये वहशियाना जूनून
भूल लम्हात की सदियों को सजा देती है

माँ सुला पाई है मुश्किल से नन्हे बच्चे को
वक़्त की सिसकियाँ फिर-फिर से जगा देती है

है सियासत की भी हर बात निराली यारों
तीलियाँ बाँट कर शम्मा को बुझा देती है ...||
                                                                                  १२/०४/2011

maan chitra

.................मान-चित्र .............

ये धरती, पूरी दुनिया /एक ही  है
इसी विश्वास के साथ
सामने दीवार पर टंगे/विश्व मान चित्र पर
समझा रहा था उन्हें सीमाओं के  संकोच
बता रहा था देशों के बारे में
जैसे की यू एस  ए क्यूं कम बोलता है
और किस तरह उसके इशारे
धमकी की तरह हो जातें है /बाकी दुनिया के लिए
की किस तरह सोवियत संघ विखंडित हो कर
रूस भर रह जाता है
और क्यु हमारे मुल्क की सियासत
लालीपॉप,गोलगुप्पे नुमा हो गई है
मै समझा रहा था ये सब की अचानक ...
विश्व मान चित्र के मध्य
उभर आया वही चेहरा / जो कल दिखाई दिया था /भरी दोपहर में
शहर के आधुनिकतम बाज़ार में
बोझा ढोते ...
या शायद ...
पत्थर तोड़तें किसी राह पर
या फिर शायद /किसी छायाहीन वृक्ष तले
हथेली पर रखे गिनती भर रुपयों को घूरता
मरे हुए स्वप्नों को लात मार
गिनती भर जरूरतों में भी/ किसी एक जरुरत का चुनाव करता
हाँ ...वही चेहरा ...
अपने स्वाभाविक तनाव ...
आहत संकोच ...
पराजय की पीड़ा /अंत की दुश्चिंता लिए
था इस समय विश्व मानचित्र पर उभर आया
मानो कहना चाहता हो ...
अमेरिका ,रूस ,ब्रिटेन
चीन, भारत ,पाकिस्तान
न्यू यार्क,लन्दन,दिल्ली,करांची
और ...और ...और................
मर्डोक, टाटा, बिडला,अम्बानी 
और ...और ...और ...
सब कुछ बताने के बाद
थोडा बहुत बताना हमारे बारे में
...आँखों से देखा हुआ
...क्युकि हम विश्व मान चित्र पर नहीं है
कहीं नहीं है ...........................................||


maa

बहुत दिनों के बाद याद आई बूढी माँ
स्मृतियों का ढेर साथ लाइ बूढी माँ

                                                          उसकी बाहें मेरा बचपन
                                                          घर का वह छोटा सा आँगन
                                                          कभी मचलता कभी संभलता
                                                          वह नन्हा प्यारा सा जीवन
मै जब भी मुस्काया, मुस्काई बूढी मां
बहुत दिनों के  बाद याद आई बूढी माँ

                                                           उसकी गोदी राज सिंहासन
                                                           उसका आँचल अमृत का घन
                                                           उसकी बांते वीणा का स्वर
                                                           उसकी आँखे स्वप्निल मधुबन
घटा भांति मन पर छाई बूढी माँ 
बहुत दिनों के बाद याद आई बूढी माँ 

                                                           माँ का वह सिमटा सा जीवन 
                                                           चक्की ,चूल्हा ,झाड़ू ,बर्तन 
                                                           बेलन ,चिमटा, फुकनी ,संसी
                                                           स्थिर जीवन ,नत परिवर्तन 
चटनी बेसन की रोटी लाइ बूढी माँ 
बहुत दिनों के बाद याद आई बूढी माँ ...||