"आदरणीय सिया जी ...आपके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना के साथ ही .....जन्मदिवस की हार्दिक-हार्दिक शुभकामनायें ...आप स्वस्थ रहें ...प्रसन्न रहें .....वो झील ,वो झरने ,पहाड़ी .वो खामोश तन्हाईयाँ .....वो कुछ कह कर ,बहुत कुछ कह जाने वाली गहन संवेदनात्मक अभिव्यक्तियाँ ....आपकी कलम के चल पड़ने की प्रतीक्षा में हैं ....हम सब आपको पूर्व की भांति गुनगुनाते -मुस्कुराते देखना चाहते हैं .......ह्रदय की पूर्ण श्रद्धा से पुनः बहुत-बहुत बधाई ....शुभकामनायें .....सादर ....."
Saturday, January 19, 2013
आदरणीय शुक्ल जी .....ये आपके मौलिक चिंतन /शैली विशेष पर पूर्ण अधिकार का ही कमाल है .....मैं बिना आपकी तस्वीर देखे /नाम पढ़े इस अनूठी रचना को पढ़ गया .....असीमित आनंद के साथ ही मात्र चार पंक्तियाँ पढ़ते ही दिमाग में आपका चेहरा और नाम कौंध उठा ...." अरे, यह तो हमारे शुक्ल जी का ही सृजन हो सकता है ....मन बोल उठा "........काव्य की इस विद्या में आपका जो नियंत्रण है ....वह माँ वीणा-वादिनी की ओर से आपको निमंत्रण है ...आप एक बहुत लम्बी यात्रा के पथिक है ...थके नहीं ....रुके नहीं ....ह्रदय से शुभकामनाएं ....सादर .....
Friday, January 18, 2013
........................( 1 )...........................................
"अभी -अभी .................................................
अभी-अभी तो उसके गालों पर लाली भर आई थी
अभी-अभी तो उसके माथे की बिंदिया मुस्काई थी
अभी-अभी तो उसके सपनो ने सम्बोधन पाए थे
अभी-अभी उसके श्रृंगारों ने नवगीत सुनाये थे
अभी-अभी उसके आँचल में चाँद-सितारे उभरे थे
अभी-अभी उसकी आँखों में कितने बादल उतरे थे
अभी-अभी उसके संकोचो ने अपने पर खोले थे
अभी-अभी तो उसके कंगन सात सुरों में बोले थे
अभी-अभी उसकी पायल को पनघट ने पहचाना था
अभी-अभी उतरी मेंहदी को फुलवारी ने जाना था
अभी-अभी उसके मन ने था रास रचा वृन्दावन का
अभी-अभी उसकी आहट पर नाच उठा घर आँगन था
अभी-अभी बस अभी अभी तो उसने जीवन जाना था
अभी-अभी बस अभी-अभी तो प्रियतम का सुख माना था ........................
............................( 2 ).......................................
अभी-अभी ......................
अभी-अभी थी चिट्ठी आई ..............................
"छत की टूटी खपरेलों का
खेंतों की अनगढ़ मेड़ों का
अम्मा-बाबू की छाती का
बहना की पावन पाती का
अपनों के स्नेहिल क्षण का
गाँव की मिटटी के कण का
यार-दोस्तों की बातों का
तुम बिन काटे दिन रातों का
मूल-ब्याज सब लौटाऊँगा
मैं इस सावन को आऊंगा .............................
...............................( 3 )...............................
अभी -अभी .................
अभी-अभी फिर सरहद कांपी ,बारूदों का शोर हुआ
अभी-अभी संदेशा आया ,युद्ध घोर घन-घोर हुआ
अभी -अभी संदेशा आया वो अब लौट न पायेगा
लेकिन उसकी वीरगती को युग-युग गाता जाएगा
अभी-अभी संदेशा आया .............
..........................( 4 )................................
अभी-अभी ...............................
अभी-अभी उसके सपने, सरहद की आंधी तोड़ गई
अभी-अभी उसके श्रृंगारों को नियति झकझोर गई
अभी-अभी उसकी आँचल से चाँद-सितारे बिखर गए
अभी-अभी उसकी आँखों में दुःख के बादल उतर गए
अभी-अभी उसकी पायल के एक-एक घुंघरू टूट गए
अभी-अभी उतरी मेंहदी को ,काल भरे क्षण लूट गए
अभी अभी अम्मा -बाबू की छाती पर वज्राघात हुआ
"अभी -अभी .................................................
अभी-अभी तो उसके गालों पर लाली भर आई थी
अभी-अभी तो उसके माथे की बिंदिया मुस्काई थी
अभी-अभी तो उसके सपनो ने सम्बोधन पाए थे
अभी-अभी उसके श्रृंगारों ने नवगीत सुनाये थे
अभी-अभी उसके आँचल में चाँद-सितारे उभरे थे
अभी-अभी उसकी आँखों में कितने बादल उतरे थे
अभी-अभी उसके संकोचो ने अपने पर खोले थे
अभी-अभी तो उसके कंगन सात सुरों में बोले थे
अभी-अभी उसकी पायल को पनघट ने पहचाना था
अभी-अभी उतरी मेंहदी को फुलवारी ने जाना था
अभी-अभी उसके मन ने था रास रचा वृन्दावन का
अभी-अभी उसकी आहट पर नाच उठा घर आँगन था
अभी-अभी बस अभी अभी तो उसने जीवन जाना था
अभी-अभी बस अभी-अभी तो प्रियतम का सुख माना था ........................
............................( 2 ).......................................
अभी-अभी ......................
अभी-अभी थी चिट्ठी आई ..............................
"छत की टूटी खपरेलों का
खेंतों की अनगढ़ मेड़ों का
अम्मा-बाबू की छाती का
बहना की पावन पाती का
अपनों के स्नेहिल क्षण का
गाँव की मिटटी के कण का
यार-दोस्तों की बातों का
तुम बिन काटे दिन रातों का
मूल-ब्याज सब लौटाऊँगा
मैं इस सावन को आऊंगा .............................
...............................( 3 )...............................
अभी -अभी .................
अभी-अभी फिर सरहद कांपी ,बारूदों का शोर हुआ
अभी-अभी संदेशा आया ,युद्ध घोर घन-घोर हुआ
अभी -अभी संदेशा आया वो अब लौट न पायेगा
लेकिन उसकी वीरगती को युग-युग गाता जाएगा
अभी-अभी संदेशा आया .............
..........................( 4 )................................
अभी-अभी ...............................
अभी-अभी उसके सपने, सरहद की आंधी तोड़ गई
अभी-अभी उसके श्रृंगारों को नियति झकझोर गई
अभी-अभी उसकी आँचल से चाँद-सितारे बिखर गए
अभी-अभी उसकी आँखों में दुःख के बादल उतर गए
अभी-अभी उसकी पायल के एक-एक घुंघरू टूट गए
अभी-अभी उतरी मेंहदी को ,काल भरे क्षण लूट गए
अभी अभी अम्मा -बाबू की छाती पर वज्राघात हुआ
Wednesday, January 16, 2013
आदरणीय संध्या जी .......सादर नमस्कार ....
"हे परम पिता !!
फेंक कर अपने
उत्तरदायित्व
गठरी में लपेट कर ,
गौतम बुद्ध सा
निकल पड़ा था एक दिन
अपने पलायन की शर्म को
तेरी खोज की गरिमा
से ढांप कर | ..."..................आजके लगभग 15 वर्ष पूर्व "यशोधरा'
पढने का अवसर मिला था मिला था ......" हाय मुझसे कह कर जाते "....के उस
करुण करुण विलाप के बीच .....गौतम बुद्ध की वह "जिज्ञासा " ..... मन को
भीतर तक व्यथित करता रहा था .... अपने उत्तरदायित्व और ईश्वरीय खोज के बीच
....मन में बहुत से प्रश्न उठे ...और निरुत्तरित शांत हो गए .....आज वही
सन्दर्भ ....आपकी इस मर्मस्पर्शी /यथार्थ बोध लिये सुन्दर रचना
में ....पूर्णतः स्पष्ट और तटस्थ वैचारिक बोध ...शंकाओं का समाधान
प्रस्तुत करते हुए .....नमन करता हूँ इस गहन वैचारिक प्रस्तुति को
....स्मृति कोष में संचित करने योग्य इस सुन्दर रचना को
...................................
कौन जान पायेगा भला ??
कि मुक्ति की ये राह
ख़त्म होती है .....
असंख्य बेड़ियों पर ..!! ........अनायास ही ....एक महान सिनेमा का अमर
पात्र (राजू गाइड ) याद हो आया .... बेड़ियों के डर से भाग ...मानवीय
कारागार से स्वतंत्रता की चाह ....भौतिक मुक्ति के लिए पहचान छुपा
....छुपता-छुपाता .....मानवीय सबलताओं /दुर्बलताओं से भरा सामान्य सा
चरित्र .....जब पीड़ित ,दुखी ,मरणासन्न जनसमुदाय के बीच पहुँचता है
...."महात्मा" मान लिया जाता है .... "महात्मा "का वह आरोपित मान/जन
विशवास ....."राजू गाइड "को कहीं पीछे धकेल उसकी आत्मा को परमात्मा के
चमत्कृत अनुभव से "दिव्य शून्यता " से भर देता है .....और फिर मृत्यु नहीं
मुक्ति ....केवल मुक्ति .....असल मुक्ति ...न स्ययम के पतित होने की कुंठा
/न स्ययम के संत होने का अभिमान ....मुक्ति मात्र मुक्ति
...........आदरणीय संध्या जी .... उस महान सिनेमा के उन अंतिम दृश्यों में
....मै स्ययम को रोने से रोक नहीं पाया था ...लगातार रोता रहा था ....
"मैंने व्यतिगत जीवन में "राजू गाइड "के विचलन को अधिक जिया है ...बहुत सी
त्रुटियाँ /भूल की ...बहुत से लोगो को दुखी किया ,स्ययम के साथ-साथ सब को
छला ....." लेकिन मेरा वह विलाप निःसंदेह "राजू गाइड " की मृत्यु पर नहीं
था ......उसकी महान मुक्ति के प्रति था ......वह महान मुक्ति जो
....जंगलों में तप से नहीं ....धर्मग्रंथों के जप से नहीं ....पलायन के पथ
से नहीं .......मिलती है तो बस ....जन की सेवा में स्ययम को शून्य बना लेने
की चाह में ...................
(क्षमा चाहूँगा ....आदरणीय संध्या जी .....आपकी इस रचना का भाव /स्वर
अभिशापित रूप में लगातार अपने जीवन में भोगता रहा हूँ .... विडम्बना देखिये
.....न पलायन का विकल्प शेष है ....न ही मुक्ति का संकल्प संभव .... रचना
से पृथक व्यतिगत अनुभूति /पीड़ा को भी कह गया ......कृपया क्षमा कीजियेगा
.....सादर ....शत -शत नमन आपकी इस नवीन दृष्टि बोध देती सुन्दर रचना को
....आपको .....सादर ......
आदरणीय संध्या जी .......सादर नमस्कार ....
"हे परम पिता !!
फेंक कर अपने
उत्तरदायित्व
गठरी में लपेट कर ,
गौतम बुद्ध सा
निकल पड़ा था एक दिन
अपने पलायन की शर्म को
तेरी खोज की गरिमा
से ढांप कर | ..."..................आजके लगभग 15 वर्ष पूर्व "यशोधरा' पढने का अवसर मिला था मिला था ......" हाय मुझसे कह कर जाते "....के उस करुण करुण विलाप के बीच .....गौतम बुद्ध की वह "जिज्ञासा " ..... मन को भीतर तक व्यथित करता रहा था .... अपने उत्तरदायित्व और ईश्वरीय खोज के बीच ....मन में बहुत से प्रश्न उठे ...और निरुत्तरित शांत हो गए .....आज वही सन्दर्भ ....आपकी इस मर्मस्पर्शी /यथार्थ बोध लिये सुन्दर रचना में ....पूर्णतः स्पष्ट और तटस्थ वैचारिक बोध ...शंकाओं का समाधान प्रस्तुत करते हुए .....नमन करता हूँ इस गहन वैचारिक प्रस्तुति को ....स्मृति कोष में संचित करने योग्य इस सुन्दर रचना को ...................................
कौन जान पायेगा भला ??
कि मुक्ति की ये राह
ख़त्म होती है .....
असंख्य बेड़ियों पर ..!! ........अनायास ही ....एक महान सिनेमा का अमर पात्र (राजू गाइड ) याद हो आया .... बेड़ियों के डर से भाग ...मानवीय कारागार से स्वतंत्रता की चाह ....भौतिक मुक्ति के लिए पहचान छुपा ....छुपता-छुपाता .....मानवीय सबलताओं /दुर्बलताओं से भरा सामान्य सा चरित्र .....जब पीड़ित ,दुखी ,मरणासन्न जनसमुदाय के बीच पहुँचता है ...."महात्मा" मान लिया जाता है .... "महात्मा "का वह आरोपित मान/जन विशवास ....."राजू गाइड "को कहीं पीछे धकेल उसकी आत्मा को परमात्मा के चमत्कृत अनुभव से "दिव्य शून्यता " से भर देता है .....और फिर मृत्यु नहीं मुक्ति ....केवल मुक्ति .....असल मुक्ति ...न स्ययम के पतित होने की कुंठा /न स्ययम के संत होने का अभिमान ....मुक्ति मात्र मुक्ति ...........आदरणीय संध्या जी .... उस महान सिनेमा के उन अंतिम दृश्यों में ....मै स्ययम को रोने से रोक नहीं पाया था ...लगातार रोता रहा था .... "मैंने व्यतिगत जीवन में "राजू गाइड "के विचलन को अधिक जिया है ...बहुत सी त्रुटियाँ /भूल की ...बहुत से लोगो को दुखी किया ,स्ययम के साथ-साथ सब को छला ....." लेकिन मेरा वह विलाप निःसंदेह "राजू गाइड " की मृत्यु पर नहीं था ......उसकी महान मुक्ति के प्रति था ......वह महान मुक्ति जो ....जंगलों में तप से नहीं ....धर्मग्रंथों के जप से नहीं ....पलायन के पथ से नहीं .......मिलती है तो बस ....जन की सेवा में स्ययम को शून्य बना लेने की चाह में ...................
(क्षमा चाहूँगा ....आदरणीय संध्या जी .....आपकी इस रचना का भाव /स्वर अभिशापित रूप में लगातार अपने जीवन में भोगता रहा हूँ .... विडम्बना देखिये .....न पलायन का विकल्प शेष है ....न ही मुक्ति का संकल्प संभव .... रचना से पृथक व्यतिगत अनुभूति /पीड़ा को भी कह गया ......कृपया क्षमा कीजियेगा .....सादर ....शत -शत नमन आपकी इस नवीन दृष्टि बोध देती सुन्दर रचना को ....आपको .....सादर ......
Sunday, January 13, 2013
दहशत में जो सूख गया गौर से सुनो जरा ,
युद्ध युद्ध युद्ध ये दरख्त की पुकार है !! .............................जय हो जय हो ....जय हो ....आदरणीय अशोक जी ......क्रिया जितनी तीव्र हो ....प्रतिक्रिया भी उतनी ही तेज और असरकारक होनी चाहिए ... कविता के इस स्वाभाविक आक्रोश ने रक्तसंचार की गति बाधा दी .......सादर।
Friday, January 11, 2013
" आदरणीय विनोद जी ...आदरणीय नवल जी सत्य कहा ...."यह मेरा आक्रोश नहीं ...बतौर पाठक मेरा क्षोभ है ....एक समृद्ध रचनाकर की ....साथी रचना के प्रति ........मैं थोडा स्पष्ट करता हूँ ......" आप जिस विषय पर खंड-काव्य लिखने चाह रहे हैं ...वह सर्वव्यापी है ...यत्र-तत्र -सर्वत्र ....मानवीय सभ्यता ने नए-नए सोपान रचे ....नए-नए क्षितिज गढ़े ....बहुत तरक्की की ....लेकिन ....लेकिन ...भूख ,ग़रीबी ,लाचारी ,असमानता दानवीय विकृतियों को दूर नहीं कर सका ...सरकारी प्रपत्रों /अखबारों /आंदोलनों में बस यह एक आंकड़ा आधारित नारा भर रह जाता है ...नारों में सतही उत्साह ...क्षणिक उत्तेजना ...विचारहीन आक्रोश .....
भूख बिलबिलाती रहती हैं ....हम रोटी के वादों /दावो का दम भरते रहते हैं ...ऐसा ही होता रहा है
भूख बिलबिलाती रहती हैं ....हम रोटी के वादों /दावो का दम भरते रहते हैं ...ऐसा ही होता रहा है
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