"नहीं आदरणीय नवल जी ...यह मात्र पढने में कोई मात्रात्मक दोष नहीं था ....यह एक पाठक का नैतिक ,वैचारिक अपराध है ...यदि मै बतौर पाठक आपको पहले से पढता रहा हूँ ...आपकी रचनाओ में आपकी छवि गढ़ता रहता हूँ तो यह अपराध अक्षम्य है .....हिन्द या हिन्दू के संशय में ...बतौर रचनाकार /पाठक आपकी निष्पक्षता को भूल बैठा
Wednesday, January 9, 2013
Monday, June 20, 2011
कौन कहेगा ...कौन कहेगा ...कौन कहेगा ....
डाल से टूटे पत्तो की पीड़ा को कौन कहेगा
तिल-तिल कर जलते दीपक के दर्द को कौन सहेगा
कौन लिखेगा बिन बरसे बादल है क्यूँ खो जाते
कौन लिखेगा भ्रमर हैं गीत कौन सा गाते
कौन लिखेगा नारी के अंतस के ध्वंद समर को
कौन लिखेगा परिवर्तन कारी युग संस्कृतियों के रण को
कौन लिखेगा अडिग मौन धारी श्रृष्टि की पीड़ा
कौन लिखेगा मान सरोवर में हंसो की क्रीडा
कौन लिखेगा खग समूह के वायु पथ का कलरव
कौन लिखेगा दर्पण के सम्मुख नव-वधु का अनुभव
कौन लिखेगा मानवता के प्रतिक्षण ह़ास का कारण
कौन लिखेगा न्याय ने किया क्यूँ मौन व्रत धारण
कौन लिखेगा वर्तमान के रक्त सने अध्याय
कौन लिखेगा ध्वज अधर्म के क्यूँ चहु दिशी लहराये
जो यह सब लिख देगा वह सच्चे अर्थो में कवि है
दूर तिमिर को करने हेतु नव प्रभात ,नव रवि है"
१७/०६/२०००
Tuesday, April 12, 2011
.....................बस यूँ ही ...............................
चंद शक्लों ने ही नफ़रत की फसल बोई है
अनगिनत शक्ल मोहब्बत की अजां देती है
बम ,बारूद ,धमाके,ये वहशियाना जूनून
भूल लम्हात की सदियों को सजा देती है
माँ सुला पाई है मुश्किल से नन्हे बच्चे को
वक़्त की सिसकियाँ फिर-फिर से जगा देती है
है सियासत की भी हर बात निराली यारों
तीलियाँ बाँट कर शम्मा को बुझा देती है ...||
१२/०४/2011
maan chitra
.................मान-चित्र .............
ये धरती, पूरी दुनिया /एक ही है
ये धरती, पूरी दुनिया /एक ही है
इसी विश्वास के साथ
सामने दीवार पर टंगे/विश्व मान चित्र पर
समझा रहा था उन्हें सीमाओं के संकोच
बता रहा था देशों के बारे में
जैसे की यू एस ए क्यूं कम बोलता है
और किस तरह उसके इशारे
धमकी की तरह हो जातें है /बाकी दुनिया के लिए
की किस तरह सोवियत संघ विखंडित हो कर
रूस भर रह जाता है
और क्यु हमारे मुल्क की सियासत
लालीपॉप,गोलगुप्पे नुमा हो गई है
मै समझा रहा था ये सब की अचानक ...
विश्व मान चित्र के मध्य
उभर आया वही चेहरा / जो कल दिखाई दिया था /भरी दोपहर में
शहर के आधुनिकतम बाज़ार में
बोझा ढोते ...
या शायद ...
पत्थर तोड़तें किसी राह पर
या फिर शायद /किसी छायाहीन वृक्ष तले
हथेली पर रखे गिनती भर रुपयों को घूरता
मरे हुए स्वप्नों को लात मार
गिनती भर जरूरतों में भी/ किसी एक जरुरत का चुनाव करता
हाँ ...वही चेहरा ...
अपने स्वाभाविक तनाव ...
आहत संकोच ...
पराजय की पीड़ा /अंत की दुश्चिंता लिए
था इस समय विश्व मानचित्र पर उभर आया
मानो कहना चाहता हो ...
अमेरिका ,रूस ,ब्रिटेन
चीन, भारत ,पाकिस्तान
न्यू यार्क,लन्दन,दिल्ली,करांची
और ...और ...और................
मर्डोक, टाटा, बिडला,अम्बानी
और ...और ...और ...
सब कुछ बताने के बाद
थोडा बहुत बताना हमारे बारे में
...आँखों से देखा हुआ
...क्युकि हम विश्व मान चित्र पर नहीं है
कहीं नहीं है ...........................................||
maa
बहुत दिनों के बाद याद आई बूढी माँ
स्मृतियों का ढेर साथ लाइ बूढी माँ
उसकी बाहें मेरा बचपन
घर का वह छोटा सा आँगन
कभी मचलता कभी संभलता
वह नन्हा प्यारा सा जीवन
मै जब भी मुस्काया, मुस्काई बूढी मां
बहुत दिनों के बाद याद आई बूढी माँ
उसकी गोदी राज सिंहासन
उसका आँचल अमृत का घन
उसकी बांते वीणा का स्वर
उसकी आँखे स्वप्निल मधुबन
घटा भांति मन पर छाई बूढी माँ
बहुत दिनों के बाद याद आई बूढी माँ
माँ का वह सिमटा सा जीवन
चक्की ,चूल्हा ,झाड़ू ,बर्तन
बेलन ,चिमटा, फुकनी ,संसी
स्थिर जीवन ,नत परिवर्तन
चटनी बेसन की रोटी लाइ बूढी माँ
बहुत दिनों के बाद याद आई बूढी माँ ...||
ना प्रेम पुष्प खिल सके ....
विदीर्ण हो गया ह्रदय
न सुर रहा रही न लय
नस-नस में मॉस पिंड के
था मच रहा महाप्रलय
स्नेह के क्षण मात्र भी न मिल सके
न प्रेम पुष्प खिल सके .......
मै छाँव की तरह रहा
वो धूप, जो न ढल सकी
पतंगे सा मै जल गया
वो मोम न पिघल सकी
जो घाव ह्रदय में हुए न सिल सके
न प्रेम पुष्प खिल सके ......................................||
१२/०४/2011
घन गरज-गरज रिम झिम बरसे
तन हो पुलकित मन भी हर्षे
ऐसे में प्रियतम आन मिले
बांहों में भर ले आ कर के
घन गरज ............
है झुलस रही यह देह सखी
अधरों पर प्यास है जाग उठी
यौवन की कलियाँ झूम रही
मन उपवन में हडकंप मची
आश्वाशन ओढ़ भला कब तक
प्रियतम वियोग में मन तरसे
घन गरज ..........
है नाच उठी धरती सारी
इठलाती बादरिया कारी
भीगे छप्पर भीगे आँगन
भीगे कोयलिया कजरारी
है मात्र मेरा ही शौक दिवस
मन व्याकुल दुख की गागर से
घ गरज ............
वो आज सखी जो आजायें
तो नयनों को सुख पहुचाएं
मनुहार करे स्वीकार करे
बांहों का आँचल पहनाएं
बन कर विशाल मै नदी
पुनः मिल जाऊं अपने सागर से
घन गरज-गरज रिम झिम बरसे
तन हो पुलकित मन भी हरसे
ऐसे में प्रियतम आन मिले
बांहों में भर ले आ कर के ...||
१२/०४/2011
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